श्रीरंगम तिरुचिरापल्ली, तमिलनाडु, भारत का विष्णु मंदिर


श्रीरंगम नगर का विकासएक पंथ तीर्थके इर्द-गिर्दपवित्र केंद्रके रूप में हुआ| यह तिरुचिरापल्ली से सात किलोमीटर दूर है, मरुतम जोन में आता है तथा कावेरी और कोल्लीडम नदियों के साथ स्थित है| इसका अभ्युदय मुख्य रूप से इसके पीठासीन देवता श्री वैष्णवों के विष्णु के रंगनाथस्वामी मंदिर के कारण हुआ था|

उत्तर संगम साहित्य में श्रीरंगम को तुरूती कहा गया है जो मायोन की पूजा का केंद्र है जिसमें उपासना स्थल का कोई स्थान नही है| तथापि भक्ति के साथ उपासना स्थल और तीर्थ का विचार पवित्र स्थल से जुड़ गया| इस प्रकार स्थानीय तथा महाकाव्य-पौराणिक परम्परा का मेल हुआ और मायोन कि पहचान विष्णु के साथ कि जाने लगी|नदियों/आद्र भूमियों के संगम पर स्थित इस क्षेत्र में एक प्रमुख नगरीय केंद्र के रूप में उभरने की सभी संभावनाएं थी| तथापि, संगम काल तक प्राचीनतम तीर्थ उपासना स्थल के रूप में कांचीपुरम और तिरुपति का दावा था और इस क्षेत्र में किसी भी संरचनात्मक उपासना स्थल का कोई सन्दर्भ किसी को नहीं मिलता है|भक्ति के कारण ही इस क्षेत्र को वास्तव में आगे आने में मदद मिली|
छठी सदी में दो शाखाओं में नगरीय विकास दृश्यमान था : पहला नगरीकरण फैलते हुए आंतरिक भू-भाग के कारण उत्प्रेरित हुआ जिसने नई कृषक बसावटों को एकीकृत किया और परिणामस्वरूप जनजातीय जनसंख्या का कृषकीकरण हुआ; दूसरा नई राज्य प्रणालियों का उदय हुआउत्तर में कांची के पल्लव, दक्षिण में मदुरई के पांड्य, दक्षिण पश्चिम में चेर और कावेरी घाटी में चोल| इन राज्यों ने स्वयं को नाडुओं के माध्यम से समेकित किया तथा ब्रह्मदेय के नवसृजित नेटवर्क तथा राजकीय उपक्रमों के फलस्वरूप मन्दिरों को संरक्षण प्रदान कर वैधता प्रदान की| मंदिर के निकाय, सभा ने मंदिर को विनियमित किया और उपहारों और दानों के संबंध में व्यवस्था की और धान तथा सोने के विनिमय जैसे आर्थिक लेन देन ने काफी संलिप्त रहे| मंदिर और ब्रह्मदेय दोनों ने विभिन्न किसान और जनजातीय समूहों को व्यापक वर्ण जाति संरचना में एकीकृत किया तथा मंदिर पवित्र कार्यकलापों का केंद्र बन गया|
11वीं सदी तकपरिसंरचण और पुनर्वितरण पर आधारित अर्थव्यवस्थाका महत्व बढ़ा| सुदूरवर्ती तंजावुर और ननमलिनाडु और पाण्ड्यनाडु के क्षेत्र खासकर ताम्रपर्णी नदी घाटी जोन से भी उपासना स्थल को दान देने का विवरण प्राप्त होता है| चारागही समूहों ने दूध और घी के लिए गायों का दान किया| मंदिरों को राजकीय संरक्षण भी प्राप्त हुआ| चोल राजा कुलोटुंगा प्रथम की रानी ने मंदिर को उदारतापूर्वक भूमि अनुदान दिया| यहाँ तक कि इसी प्रकार के अनुदान काकतीय, गजपति और विजयनगर शासकों के द्वारा श्रीरंगम मंदिर को दिया गया जिससे स्पष्ट रूप से पता चलता है कि शासकों के द्वारा अपनी राजनीतिक सत्ता को वैध बनाने के लिए मंदिर के प्रभाव का प्रयोग किया गया|
श्री वैष्णव मंदिर की धार्मिक आनुष्ठानिक संरचना और मजबूत हुई| पहली बार मंदिर प्रशासन में श्रीकार्यम की मौजूदगी पाई गई| इनके प्रमुख कार्य झंडों के लिए चबूतरों के निर्माण, उपहारों के मोल-तोल, बकायों के निपटारा आदि थे| अब मंदिर के धार्मिक अनुष्ठान और अधिक जटिल हो गएवेदों का पाठ, देवता के पवित्र स्नान के उत्सव| पांड्यों के अधीन सरकारी तंत्र में एक परिवर्तन आया, ब्राह्मणों के अलावा गैर-ब्राह्मणों को भी शामिल किया गया| मुख्य रूप से पुष्प उद्यानों, धार्मिक अनुष्ठानों के निष्पादन तथा उत्सव मनाने के उद्देश्य से भूमि अनुदान दिए गए थे| यहाँ तक कि श्री वैष्णव मंदिर का सामाजिक आधार भी बढ़ गया|विशिष्ट क्षेत्र को मंदिर इसलिए कहा गया है क्योंकि मंदिर आर्थिक गतिविधियों के स्रोत बने| इस प्रकार श्रीरंगम एक पंथ के केंद्र के रूप में विकसित हुआ|
श्रीरंगम को नवग्रह स्थालों में से एक के रूप में भी सूचीबद्ध किया गया है, या ग्रहों का प्रतिनिधित्व करने वाले मंदिर हैं। इस समूह में दक्षिण भारतीय मंदिर हैं:

भारत के तीर्थ स्थानों का परिचय

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